ख़बर रफ़्तार , रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के बढ़ते आकर्षण के बीच पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। लोग हिमालय की खूबसूरत वादियों और प्राकृतिक नजारों का आनंद लेने तो पहुंच रहे हैं, लेकिन कई पर्यटक अपने पीछे प्लास्टिक की बोतलें और खाद्य पदार्थों के पैकेट छोड़कर लौट रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण केदारनाथ धाम के पास स्थित वासुकी ताल में देखने को मिला है। समुद्र तल से करीब 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस खूबसूरत ताल में प्लास्टिक कचरे का ढेर जमा हो रहा है। इससे हिमालय के संवेदनशील पर्यावरण पर खतरा मंडराने लगा है।
14,200 फीट की ऊंचाई पर भी नहीं थम रहा प्लास्टिक प्रदूषण
वासुकी ताल केदारनाथ धाम से करीब 8 से 10 किलोमीटर की कठिन पैदल दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं और पर्यटकों को दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद इस ऊंचाई पर प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य सामग्री के रैपर और अन्य कचरा बड़ी मात्रा में दिखाई दे रहा है।
हैरानी की बात यह है कि जिस स्थान तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, वहां तक प्लास्टिक कचरा तो पहुंच रहा है, लेकिन पर्यटकों की ओर से उसे वापस लाने की जिम्मेदारी नहीं निभाई जा रही है। इससे वासुकी ताल की प्राकृतिक सुंदरता प्रभावित होने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण के दावों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय युवक ने खुद उठाई सफाई की जिम्मेदारी
वासुकी ताल में बढ़ते प्रदूषण के बीच स्थानीय जागरूक युवक दुर्गा प्रसाद देवशाली ने सराहनीय पहल की है। वह स्वयं वासुकी ताल पहुंचे और वहां बिखरे प्लास्टिक कचरे को एकत्रित कर सफाई अभियान चलाया। इस पहल के जरिए उन्होंने पर्यटकों और स्थानीय लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
दुर्गा प्रसाद देवशाली का कहना है कि हिमालय केवल घूमने-फिरने का स्थान नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी स्वच्छता और सुरक्षा बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
पर्यटकों से की कचरा वापस ले जाने की अपील
दुर्गा प्रसाद देवशाली ने वासुकी ताल पहुंचने वाले पर्यटकों से अपील की है कि वे अपने साथ प्लास्टिक की बोतलें, खाने-पीने के पैकेट और अन्य कचरा वापस लेकर आएं। उनका कहना है कि प्रकृति को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी केवल सरकारी विभागों की नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो इन खूबसूरत स्थानों पर घूमने पहुंचता है।
उन्होंने कहा कि अगर प्रत्येक पर्यटक अपने साथ लाए कचरे को वापस ले जाने की आदत बना ले, तो उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
2013 की केदारनाथ आपदा का दिया उदाहरण
देवशाली ने वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा का जिक्र करते हुए हिमालय की संवेदनशीलता को समझने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और पर्यावरण के प्रति लापरवाही के परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं, इसका दर्दनाक उदाहरण केदारघाटी पहले ही देख चुकी है।
उनका कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रहा प्लास्टिक प्रदूषण भविष्य में पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इसलिए समय रहते इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
वासुकी ताल को प्लास्टिक मुक्त रखने के लिए उठाए जाएंगे कदम: DM
वासुकी ताल में प्लास्टिक कचरे की समस्या को लेकर रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी विशाल मिश्रा ने भी संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि वासुकी ताल में प्लास्टिक कचरे के निस्तारण को लेकर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे। धार्मिक स्थलों को प्लास्टिक मुक्त रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं।
नियमित निगरानी और सख्त कार्रवाई की मांग
दुर्गा प्रसाद देवशाली ने केदारनाथ वन प्रभाग से वासुकी ताल क्षेत्र में नियमित निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि पर्यटकों द्वारा फैलाए जा रहे प्लास्टिक कचरे को वापस लाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने पर्यटकों को जागरूक करने, प्रतिबंधित प्लास्टिक के इस्तेमाल पर सख्ती से रोक लगाने और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग भी उठाई है।
वासुकी ताल की यह स्थिति हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती को उजागर करती है। अगर समय रहते प्लास्टिक कचरे पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में इन प्राकृतिक धरोहरों की सुंदरता और पारिस्थितिकी दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
