ख़बर रफ़्तार , नई दिल्ली : भारत में बिजली की बढ़ती मांग और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार समुद्र की हवा का इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री तटों पर अपतटीय पवन ऊर्जा यानी Offshore Wind Energy परियोजनाएं विकसित करने की योजना इसी प्रयास का हिस्सा है। इन परियोजनाओं के जरिए समुद्र में चलने वाली तेज हवाओं से बिजली बनाई जाएगी और उसे ग्रिड के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचाया जाएगा।
केंद्र सरकार ने जून 2024 में देश की शुरुआती अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (Viability Gap Funding यानी VGF) योजना को मंजूरी दी थी। इसके तहत गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 500-500 मेगावाट क्षमता की परियोजनाओं के लिए ₹6,853 करोड़ का प्रावधान किया गया। इसके अतिरिक्त, परियोजनाओं की लॉजिस्टिक्स जरूरतों के लिए दो बंदरगाहों के उन्नयन हेतु ₹600 करोड़ रखे गए। इस प्रकार पूरी योजना का कुल परिव्यय ₹7,453 करोड़ है। <Cite refs={[“turn966667search1″,”turn966667search2”]}/>
भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है
देश में घरों, उद्योगों, कृषि और परिवहन क्षेत्रों में बिजली की जरूरत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बिजली उत्पादन के लिए पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 के अंत तक भारत की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 555 गीगावाट (GW) तक पहुंच गई थी। इसमें गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों का हिस्सा लगभग 55 प्रतिशत था। सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 168 GW और पवन ऊर्जा की क्षमता लगभग 59 GW दर्ज की गई। <Cite refs={[“turn966667search0”]}/>
हालांकि, स्थापित क्षमता और वास्तव में उत्पादित बिजली में अंतर होता है। मौसम, उपलब्ध ईंधन, संयंत्रों की कार्यक्षमता और बिजली की मांग जैसे कारक वास्तविक उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
CREA के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही में देश का कुल बिजली उत्पादन सालाना आधार पर 11 प्रतिशत बढ़कर 536 अरब यूनिट पहुंच गया। इसी अवधि में कोयले से बिजली उत्पादन में इसकी प्रमुख भूमिका बनी रही। <Cite refs={[“turn966667search0”]}/>
समुद्र में क्यों लगाए जा रहे हैं पवन ऊर्जा प्लांट?
जमीन पर स्थापित पवन चक्कियों की तुलना में समुद्र में पवन ऊर्जा परियोजनाओं की कुछ खास विशेषताएं होती हैं। समुद्र के खुले क्षेत्रों में हवा की गति अपेक्षाकृत तेज और अधिक स्थिर हो सकती है। इससे पवन टर्बाइनों को लंबे समय तक बिजली उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियां मिल सकती हैं।
समुद्र में बड़े आकार के टर्बाइन लगाने से भूमि की उपलब्धता से जुड़ी कुछ चुनौतियां भी कम हो सकती हैं। इसके अलावा, समुद्री पवन ऊर्जा के विकास से टर्बाइन निर्माण, समुद्री इंजीनियरिंग, बंदरगाह सेवाओं और बिजली ट्रांसमिशन जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
हालांकि, समुद्र में परियोजनाएं बनाना जमीन की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक जटिल और महंगा हो सकता है। टर्बाइनों की स्थापना, समुद्री मौसम, रखरखाव और बिजली को तट तक पहुंचाने के लिए विशेष बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है। <Cite refs={[“turn966667search1″,”turn966667search6”]}/>
गुजरात और तमिलनाडु को क्यों चुना गया?
केंद्र सरकार ने शुरुआती अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए गुजरात और तमिलनाडु के समुद्री क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है। इन तटों पर पवन ऊर्जा की संभावनाओं को लेकर तकनीकी और व्यावसायिक अध्ययन किए गए हैं।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) और राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान (NIWE) की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गुजरात के समुद्री तट के आसपास लगभग 36 GW और तमिलनाडु के तट के आसपास लगभग 35 GW की अपतटीय पवन ऊर्जा क्षमता की प्रारंभिक संभावनाएं आंकी गई हैं। ये संभावित क्षमता के आकलन हैं, न कि पहले से चालू बिजली संयंत्रों की क्षमता। <Cite refs={[“turn966667search6”]}/>
सरकार की स्वीकृत VGF योजना के तहत इन दोनों राज्यों में शुरुआती 1 GW क्षमता विकसित करने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य परियोजनाओं की लागत से जुड़ी चुनौतियों को कम करना और निजी निवेशकों के लिए इन्हें व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने में सहायता देना है।
समुद्र की हवा से कैसे बनेगी बिजली?
अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं में समुद्र के भीतर या समुद्र की सतह पर टर्बाइन स्थापित किए जाते हैं। हवा चलने पर टर्बाइन के ब्लेड घूमते हैं और जनरेटर की मदद से बिजली पैदा होती है।
समुद्री पवन ऊर्जा परियोजनाओं में मुख्य रूप से दो तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
1. फिक्स्ड-फाउंडेशन टर्बाइन
इस तकनीक में टर्बाइन को मजबूत स्टील संरचनाओं या नींव के जरिए समुद्र की तलहटी से जोड़ा जाता है। इसका इस्तेमाल उन समुद्री क्षेत्रों में किया जाता है जहां पानी की गहराई और समुद्र तल की परिस्थितियां इसके अनुकूल हों।
2. फ्लोटिंग विंड टर्बाइन
इस तकनीक में टर्बाइन को तैरने वाले प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया जाता है। इन्हें मजबूत रस्सियों या जंजीरों जैसी मूरिंग व्यवस्था से समुद्र तल के साथ जोड़ा जाता है, ताकि वे निर्धारित क्षेत्र में स्थिर रह सकें। यह तकनीक अधिक गहरे समुद्री क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है।
दोनों ही व्यवस्थाओं में उत्पादित बिजली को समुद्र के भीतर बिछाई गई केबलों और संबंधित ट्रांसमिशन ढांचे के जरिए तट पर स्थित ग्रिड तक पहुंचाया जा सकता है।
₹6,853 करोड़ की सहायता से क्या होगा?
केंद्र सरकार की मंजूर योजना के तहत ₹6,853 करोड़ की VGF सहायता गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर कुल 1 GW यानी 1,000 मेगावाट क्षमता की अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना और उन्हें चालू करने के लिए निर्धारित की गई है।
इसमें प्रत्येक राज्य के समुद्री तट के पास 500 MW क्षमता विकसित करने का प्रावधान है। यह 500 GW नहीं, बल्कि 500 MW प्रति राज्य है। इसके अतिरिक्त, ₹600 करोड़ की सहायता दो बंदरगाहों के उन्नयन के लिए निर्धारित की गई है। <Cite refs={[“turn966667search1″,”turn966667search2”]}/>
सरकारी योजना के अनुसार, निजी डेवलपर पारदर्शी बोली प्रक्रिया के जरिए परियोजनाओं का विकास करेंगे। वहीं, अपतटीय सबस्टेशन सहित बिजली निकासी से जुड़े बुनियादी ढांचे में पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (PGCIL) की भूमिका निर्धारित की गई है। <Cite refs={[“turn966667search1”]}/>
2030 तक 30 GW अपतटीय पवन ऊर्जा का लक्ष्य
भारत की अपतटीय पवन ऊर्जा रणनीति में वर्ष 2030 तक 30 GW क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। यह समुद्र में पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार से संबंधित लक्ष्य है, न कि भारत की कुल पवन ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य।
देश में जमीन पर स्थापित पवन ऊर्जा परियोजनाएं पहले से बिजली उत्पादन में योगदान दे रही हैं। समुद्री परियोजनाओं का विकास इस क्षेत्र में एक नया विकल्प उपलब्ध करा सकता है। हालांकि, 2030 के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए परियोजनाओं की मंजूरी, निवेश, तकनीकी तैयारी, समुद्री सर्वेक्षण और ट्रांसमिशन नेटवर्क का समय पर विकास जरूरी होगा। <Cite refs={[“turn966667search6″,”turn966667search8”]}/>
रिन्यूएबल एनर्जी बढ़ने से क्या होगा फायदा?
अपतटीय पवन ऊर्जा का विस्तार भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है। इससे ऊर्जा स्रोतों में विविधता बढ़ेगी और बिजली उत्पादन में कोयले पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को समर्थन मिल सकता है।
इसके अलावा, इस क्षेत्र में निवेश से घरेलू उपकरण निर्माण, समुद्री परिवहन, बंदरगाह विकास और तकनीकी सेवाओं को बढ़ावा मिल सकता है। सरकार के मुताबिक, अपतटीय पवन ऊर्जा क्षेत्र में निवेश से रोजगार और देश में तकनीकी क्षमताओं के विकास के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। <Cite refs={[“turn966667search1”]}/>
हालांकि, पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर करती है। इसलिए इसकी क्षमता का पूरा उपयोग करने के लिए मजबूत बिजली ग्रिड, ऊर्जा भंडारण और उत्पादन का सटीक पूर्वानुमान भी महत्वपूर्ण है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों में समुद्री हवा की बढ़ेगी भूमिका
भारत में बिजली की मांग बढ़ने के साथ स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का विस्तार ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। गुजरात और तमिलनाडु की प्रस्तावित अपतटीय पवन ऊर्जा परियोजनाएं इसी दिशा में एक अहम पहल हैं।
₹6,853 करोड़ की निर्धारित सहायता से कुल 1 GW क्षमता वाली शुरुआती परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की योजना है, जबकि बंदरगाहों के विकास के लिए अतिरिक्त बजट रखा गया है। इन परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति, निर्माण और बिजली उत्पादन की स्थिति आने वाले समय में स्पष्ट होगी।
यदि तकनीकी और वित्तीय चुनौतियों को प्रभावी तरीके से दूर किया जाता है, तो समुद्र की हवा भविष्य में भारत के बिजली उत्पादन के विविध स्रोतों में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
