Banshidhar Bhagat : 51 साल से रामलीला में राजा दशरथ का किरदार निभा रहे बंशीधर भगत, 7 बार बने विधायक

खबररफ़्तार , हल्द्वानी : उत्तराखंड के वरिष्ठ भाजपा नेता और कालाढूंगी से विधायक बंशीधर भगत राजनीति के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी बरकरार रखे हुए हैं। हल्द्वानी के ऊंचापुल में आयोजित रामलीला में वह पिछले 51 वर्षों से राजा दशरथ का किरदार निभाते आ रहे हैं। इन दिनों मंच पर उनके अभिनय को देखने के लिए दर्शकों में खासा उत्साह नजर आ रहा है।

सात बार विधायक चुने जा चुके और उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी निभा चुके बंशीधर भगत का रामलीला से जुड़ाव दशकों पुराना है। राजनीतिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने रंगमंच की परंपरा को नहीं छोड़ा। यही वजह है कि राजा दशरथ के रूप में उनकी प्रस्तुति रामलीला देखने आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण बनी हुई है।

17 साल की उम्र से शुरू हुआ रंगमंच का सफर

बंशीधर भगत का रामलीला से जुड़ाव युवावस्था में शुरू हुआ था। उन्होंने करीब 17 साल की उम्र में रंगमंच पर अभिनय करना शुरू किया। शुरुआत में उन्होंने अंगद का किरदार निभाया। इसके बाद वह परशुराम और हनुमान जैसे पात्रों की भूमिका में भी नजर आए।

समय के साथ उनके अभिनय का अनुभव बढ़ता गया और धीरे-धीरे राजा दशरथ का किरदार उनकी पहचान बन गया। पिछले पांच दशकों से अधिक समय से वह इसी भूमिका को निभा रहे हैं।

भगत के लिए रामलीला केवल अभिनय का मंच नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और स्थानीय सामाजिक जीवन से जुड़ने का माध्यम भी है।

सात बार विधायक बनने के बाद भी रंगमंच से जुड़ाव

बंशीधर भगत ने अपने राजनीतिक जीवन में भी लंबा सफर तय किया है। वह कालाढूंगी क्षेत्र से सात बार विधायक चुने जा चुके हैं और उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभा चुके हैं।

राजनीति में सक्रिय रहने और सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बावजूद उनका रामलीला के प्रति लगाव बना रहा। हर साल मंच पर राजा दशरथ की भूमिका निभाकर वह अपनी इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

उनकी यह निरंतरता बताती है कि राजनीतिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी समय निकाला जा सकता है। रामलीला से उनका जुड़ाव स्थानीय कलाकारों और दर्शकों के बीच भी चर्चा का विषय रहता है।

अंगद, परशुराम और हनुमान के बाद बने राजा दशरथ

बंशीधर भगत ने अपने शुरुआती अभिनय के दिनों में रामलीला के अलग-अलग पात्रों को निभाया। अंगद, परशुराम और हनुमान की भूमिकाओं से शुरुआत करने के बाद उन्होंने राजा दशरथ का किरदार अपनाया।

इस बारे में बंशीधर भगत बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही रामलीला में अभिनय करने का शौक रहा है। उन्होंने कहा कि 17 वर्ष की उम्र से पहले भी वह नाटकों में काम करते थे। बाद में रामलीला में अंगद, परशुराम और हनुमान की भूमिकाएं निभाईं। धीरे-धीरे इन पात्रों को छोड़कर पिछले 51 वर्षों से वह राजा दशरथ का किरदार निभा रहे हैं।

उनके लंबे अनुभव का असर मंच पर उनके संवाद बोलने के अंदाज और पात्र को प्रस्तुत करने के तरीके में दिखाई देता है।

कैकेयी के साथ संवाद और पुत्र वियोग के दृश्य बनते हैं खास

रामलीला में राजा दशरथ की भूमिका भावनाओं और संवादों के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है। विशेष रूप से कैकेयी के साथ संवाद, राम के वनवास का प्रसंग और पुत्र वियोग के दृश्य दर्शकों को भावुक कर देते हैं।

बंशीधर भगत इन प्रसंगों में अपने अभिनय के जरिए राजा दशरथ की मनोदशा को मंच पर प्रस्तुत करते हैं। वर्षों के अनुभव के कारण उनके संवाद और अभिनय को दर्शकों की सराहना मिलती है।

रामलीला में उनके साथ अभिनय करने वाले अन्य कलाकार भी उनके अनुभव को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके लिए इतने लंबे समय से मंच पर सक्रिय रहने वाले कलाकार के साथ काम करना एक खास अनुभव है।

दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं भगत

हल्द्वानी के ऊंचापुल की रामलीला में राजा दशरथ के रूप में बंशीधर भगत को देखने के लिए दर्शकों में उत्सुकता रहती है। उनके अभिनय की लोग सराहना करते हैं और उनके साथी कलाकार भी चाहते हैं कि वह आगे इसी तरह मंच पर अपनी भूमिका निभाते रहें।

उनका यह सफर राजनीति और संस्कृति के बीच एक अनूठा जुड़ाव प्रस्तुत करता है। एक ओर वह जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं, तो दूसरी ओर रामलीला के मंच पर दशकों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

राजनीति के साथ संस्कृति से भी कायम रखा रिश्ता

बंशीधर भगत की 51 वर्षों की रामलीला यात्रा स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति उनके लगाव को दर्शाती है। सात बार विधायक चुने जाने और मंत्री पद की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद उन्होंने अपने अभिनय के शौक को जारी रखा।

हल्द्वानी के ऊंचापुल की रामलीला में राजा दशरथ का उनका किरदार अब उनकी विशिष्ट पहचान बन चुका है। उनका यह सफर दिखाता है कि सार्वजनिक जीवन में व्यस्त रहने के बावजूद अपनी कला, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ाव बनाए रखा जा सकता है।

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