UP के जंगलों की दुनिया देखेगी पूरी दुनिया, दुधवा , पीलीभीत के बाघों पर डॉक्यूमेंट्री बनाएंगे सुबैया नल्लामुत्थू

ख़बर रफ़्तार , लखनऊ : उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र अपने घने जंगलों, समृद्ध जैव विविधता और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। अब यहां के जंगलों और वन्यजीवों की अनोखी दुनिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी है। मशहूर वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और सिनेमेटोग्राफर सुबैया नल्लामुत्थू उत्तर प्रदेश के जंगलों में बाघों और दूसरे वन्यजीवों पर डॉक्यूमेंट्री तैयार करेंगे। इसके लिए उत्तर प्रदेश वन विभाग के साथ उनका करार हुआ है।

इस पहल के तहत दुधवा टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व, अमानगढ़ टाइगर रिजर्व और रानीपुर टाइगर रिजर्व में शूटिंग की जाएगी। इसके जरिए तराई क्षेत्र की जैव विविधता, वन्यजीवों के व्यवहार, उनके प्राकृतिक आवास और संरक्षण से जुड़े पहलुओं को दुनिया के सामने लाया जाएगा। वन विभाग को उम्मीद है कि इस पहल से उत्तर प्रदेश के जंगलों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के साथ ईको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा।

कौन हैं सुबैया नल्लामुत्थू?

सुबैया नल्लामुत्थू विश्व प्रसिद्ध वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और सिनेमेटोग्राफर हैं। उन्हें वन्यजीवों, खासकर रॉयल बंगाल टाइगर पर आधारित फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री के लिए जाना जाता है। उन्हें प्यार से ‘नल्ला’ भी कहा जाता है।

मूल रूप से तमिलनाडु के रहने वाले सुबैया को बचपन से ही जंगली जानवरों और फोटोग्राफी में दिलचस्पी थी। इसी जुनून ने उन्हें वाइल्डलाइफ सिनेमेटोग्राफी की दुनिया में पहुंचाया। उन्होंने चेन्नई के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ तमिलनाडु से शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में हाई-स्पीड कैमरामैन के रूप में काम किया।

हालांकि, वन्यजीवों के प्रति उनका आकर्षण बना रहा। बाद में उन्होंने डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक जैसे अंतरराष्ट्रीय चैनलों के लिए डॉक्यूमेंट्री शूट कीं। उनकी फिल्मों में बाघों के जीवन, उनके व्यवहार और जंगलों में उनके अस्तित्व से जुड़े कई पहलुओं को दिखाया गया है।

दुधवा से पीलीभीत तक बाघों की दुनिया को कैमरे में करेंगे कैद

उत्तर प्रदेश वन विभाग के साथ हुए करार के तहत सुबैया नल्लामुत्थू तराई क्षेत्र के प्रमुख टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों की जिंदगी को कैमरे में कैद करेंगे। इनमें दुधवा टाइगर रिजर्व, अमानगढ़ टाइगर रिजर्व, पीलीभीत टाइगर रिजर्व और रानीपुर टाइगर रिजर्व शामिल हैं।

इस परियोजना में केवल बाघों पर ही नहीं, बल्कि जंगलों में रहने वाले दूसरे वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर भी ध्यान दिया जाएगा। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार, उनके आवास, संरक्षण के प्रयासों और तराई क्षेत्र की अनूठी जैव विविधता को सामने लाने की योजना है।

तराई क्षेत्र की खासियत यह है कि यहां बाघों के साथ हाथियों और गैंडों जैसे बड़े वन्यजीवों का भी प्राकृतिक आवास मौजूद है। इसके अलावा यहां कई दुर्लभ प्रजातियां, समृद्ध वनस्पति और स्थानीय समुदायों की अपनी विशिष्ट संस्कृति है।

तीन साल तक चलेगी जंगलों की कहानी जुटाने की तैयारी

सुबैया नल्लामुत्थू के मुताबिक, उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र वन्यजीवों और प्राकृतिक विविधता के लिहाज से बेहद खास है। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में ऐसी कई कहानियां मौजूद हैं, जिन्हें अभी तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त रूप से सामने नहीं लाया गया है।

उन्होंने बताया कि वह पिछले 20 से 25 वर्षों से बाघों पर काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के जंगलों में बाघ, हाथी और गैंडे जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी इस क्षेत्र को अलग पहचान देती है।

सुबैया के अनुसार, इस परियोजना के तहत जंगलों और वन्यजीवों के साथ-साथ स्थानीय जनजातियों, रंगों, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ी कहानियों को भी जुटाया जाएगा। उनका लक्ष्य इन सभी पहलुओं को एक साथ जोड़कर ऐसी फिल्म तैयार करना है, जिसके जरिए दुनिया उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र को बेहतर ढंग से समझ सके।

उन्होंने कहा कि यहां के वन्यजीवों का व्यवहार और पर्यावरण दूसरे क्षेत्रों से अलग है। इस अंतर को डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से सामने लाना परियोजना का अहम हिस्सा होगा।

‘मछली’ डॉक्यूमेंट्री से मिली थी राष्ट्रीय पहचान

सुबैया नल्लामुत्थू इससे पहले राजस्थान के रणथंभौर और सरिस्का जैसे वन्यजीव क्षेत्रों में भी काम कर चुके हैं। बाघिन मछली पर आधारित उनकी डॉक्यूमेंट्री The World’s Most Famous Tiger को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण फिल्म का पुरस्कार मिला था।

मछली पर डॉक्यूमेंट्री बनाने में उन्हें लगभग सात साल का समय लगा। इस दौरान उन्होंने बाघिन के जीवन और जंगल में उसकी भूमिका से जुड़े विभिन्न पहलुओं को फिल्माया।

सुबैया नल्लामुत्थू को अब तक पांच राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई है। उनकी चर्चित फिल्मों और सीरीज में Life Force, Tiger Dynasty और Tiger Queen जैसी कृतियां शामिल हैं। इसके अलावा उन्हें बी. शांताराम लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।

उनका अनुभव उत्तर प्रदेश के जंगलों पर बनने वाली नई डॉक्यूमेंट्री के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ईको-टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा: वन विभाग

उत्तर प्रदेश वन विभाग के प्रमुख सुनील चौधरी के मुताबिक, सुबैया नल्लामुत्थू के साथ काम करने से तराई क्षेत्र की जैव विविधता को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में मदद मिलेगी।

उन्होंने बताया कि सुबैया ने उत्तर प्रदेश के जंगलों में शूटिंग करने की इच्छा जताई थी। इसके बाद विभाग की ओर से उन्हें निर्धारित अवधि के लिए अनुमति दी गई है। विभाग के अनुसार, शूटिंग के लिए दो साल की अनुमति दी गई है।

सुनील चौधरी का कहना है कि इस परियोजना से दुनिया भर के लोगों को उत्तर प्रदेश के जंगलों और वन्यजीवों के बारे में जानकारी मिलेगी। इससे पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय स्तर पर रोजगार व आय के अवसर बढ़ाने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

स्थानीय लोगों और जंगलों को मिलेगा फायदा

इस परियोजना का उद्देश्य केवल वन्यजीवों की खूबसूरत तस्वीरें दिखाना नहीं है, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और संरक्षण की जरूरतों को भी समझाना है। डॉक्यूमेंट्री के जरिए जंगलों के पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानीय समुदायों के बीच संबंधों को सामने लाने की योजना है।

वन्यजीवों पर आधारित फिल्मों से किसी क्षेत्र की पहचान बढ़ने पर वहां प्रकृति पर्यटन की संभावनाएं भी विकसित हो सकती हैं। इससे स्थानीय गाइड, होमस्टे संचालकों और पर्यटन से जुड़े अन्य लोगों को अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ संरक्षण और पर्यटन प्रबंधन की योजनाओं पर भी निर्भर करेगा।

कुल मिलाकर, सुबैया नल्लामुत्थू और उत्तर प्रदेश वन विभाग की यह पहल दुधवा, पीलीभीत और तराई क्षेत्र के अन्य जंगलों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले वर्षों में तैयार होने वाली डॉक्यूमेंट्री के जरिए दुनिया को उत्तर प्रदेश के बाघों, हाथियों, गैंडों और यहां की समृद्ध जैव विविधता को करीब से देखने का अवसर मिल सकता है।

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