UP: AMU सर्वे, मुस्लिम अभिभावकों में नौकरी के लिए बेटियों का समर्थन 55%

ख़बर रफ़्तार, अलीगढ़: रिपोर्ट में बताया गया है कि 100 में से 55 फीसदी अभिभावक चाहते थे कि उनकी बेटियां नौकरी करें और अपने ख्वाब को पूरा करें। 31 फीसदी अभिभावकों की मंशा थी कि उनकी बेटियां उच्च शिक्षा हासिल करें।

मुस्लिम समाज में बेटियों की शिक्षा और रोजगार को लेकर सोच में धीरे-धीरे लेकिन परिवर्तन देखने को मिल रहा है। कुछ वर्ष पहले तक अभिभावकों की धारणा थी कि बेटियां घर की दहलीज में रहें और घर के ही काम संभालें। अब अभिभावक चाहते हैं कि वह आत्मनिर्भर बनें। एएमयू के सामाजिक कार्य विभाग द्वारा पांच साल के भीतर 400 अभिभावकों पर किए गए अध्ययन में यह बदलाव सामने आया है कि 55 फीसदी मुस्लिम अभिभावक अब अपनी बेटियों के नौकरी करने के पक्ष में हैं।

सामाजिक कार्य विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर मोहम्मद उजैर और उनकी टीम द्वारा वर्ष 2020 से 2025 तक किए गए अध्ययन से मालूम होता है कि नई पीढ़ी के माता-पिता न केवल अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने की इच्छा रखते हैं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से सशक्त देखना चाहते हैं। कक्षा एक से कक्षा आठ तक पढ़ने वाले बच्चों के 400 अभिभावकों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।
इस अध्ययन में लोधा और जवां ब्लाक को शामिल किया गया था। 30 से 46 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के अभिभावकों से बच्चों की शिक्षा और भविष्य में अपेक्षा को लेकर बातचीत की गई। इनमें 265 पुरुष और 135 महिला अभिभावक शामिल थीं। अध्ययन में पता चला कि परिवार अब बेटियों को केवल घर तक सीमित नहीं देखना चाहते, बल्कि उन्हें शिक्षा के माध्यम से समाज में अपना स्थान बनाते देखना चाहते हैं।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 100 में से 55 फीसदी अभिभावक चाहते थे कि उनकी बेटियां नौकरी करें और अपने ख्वाब को पूरा करें। 31 फीसदी अभिभावकों की मंशा थी कि उनकी बेटियां उच्च शिक्षा हासिल करें। यह अध्ययन इस ओर संकेत करता है कि मुस्लिम समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण की नई लहर उठ रही है। अब अभिभावक यह समझने लगे हैं कि शिक्षित बेटी न केवल परिवार का सम्मान बढ़ाती है, बल्कि समाज में प्रगतिशील सोच की नींव भी रखती है।

55 फीसदी मुस्लिम अभिभावक चाहते हैं कि उनकी बेटियां सरकारी नौकरियों में जाएं और आला दर्जे की तालीम हासिल करें, तो यह उनका सकारात्मक नजरिया है। यही सोच यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद की भी थी। यूनिवर्सिटी भी इसी फलसफे को लेकर आगे बढ़ रही है। बेटियां जिस तरह से शिक्षा और सरकारी नौकरी के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, उससे मुस्लिम समाज आर्थिक और शैक्षिक रूप से मजबूत होगा।

सामाजिक और आर्थिक बाधाएं अब भी मौजूद

अध्ययन के मुताबिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रुकावटें अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में संसाधनों की कमी, विवाह और आर्थिक निर्भरता अब भी बेटियों की शिक्षा के रास्ते में रुकावट डालती है। बाधाओं को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इससे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन संभव है।

शोध के दौरान कुल 150 प्रश्न पूछे गए। कुछ प्रमुख सवाल

  • आपके परिवार में कितनी महिलाएं हैं। वह क्या करती हैं।
  • आपकी मां और आपकी दादी ने जैसा जीवन जिया क्या आप अपनी बेटियों के लिए वैसा ही जीवन चाहते हैं
  • आप अपनी बेटियों की शादी कितनी उम्र में करेंगे।
  • आप अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए अपनी आमदनी का कितना खर्च कर रहे हैं।
  • बेटियों को शिक्षा दिलाने का मकसद सिर्फ शिक्षित करना है या उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर बनाना है।
  • बेटियां को उनके मनपसंद क्षेत्र में करियर बनाने देंगे या आपने खुद से कोई क्षेत्र चुन रखा है।
  • आप बेटियों को शहर से बाहर या देश से बाहर नौकरी करने की इजाजत देंगे।

शिक्षा ही असली बदलाव की कुंजी
अध्ययन टीम के मार्गदर्शक रहे प्रो. नसीम अहमद खान ने बताया कि शिक्षा ही मुस्लिम समाज में सकारात्मक सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है। जैसे-जैसे बेटियों की शिक्षा और रोजगार के प्रति अभिभावकों का दृष्टिकोण बदल रहा है, वैसे-वैसे आने वाले वर्षों में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ने की संभावना है। प्रो. नसीम अहमद खान के अनुसार, यह परिवर्तन न केवल मुस्लिम समाज के लिए, बल्कि पूरे भारतीय समाज के विकास और लैंगिक समानता के लिए एक प्रेरक संकेत है।

You May Also Like

More From Author

+ There are no comments

Add yours