ख़बर रफ़्तार, बागेश्वर: 15 सितंबर 1997 का दिन Bageshwar के इतिहास में बेहद अहम माना जाता है। इसी दिन तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले से अलग कर उत्तराखंड का 12वां जिला घोषित किया था। सरयू और गोमती नदियों के संगम पर बसा बागेश्वर धार्मिक, सांस्कृतिक और सामरिक दृष्टि से अपनी अलग पहचान रखता है।
जिले के गठन के शुरुआती दौर में बागेश्वर, कपकोट और गरुड़ तहसीलों को शामिल किया गया था। इसके बाद प्रशासनिक व्यवस्था को विस्तार देते हुए कांडा, शामा और दुगनाकुरी समेत अन्य इकाइयां अस्तित्व में आईं।
अल्मोड़ा की दूरी ने खड़ा किया आंदोलन
बागेश्वर को जिला बनाने की मांग के पीछे लंबा जनआंदोलन रहा। जिला बनने से पहले दूरस्थ गांवों के लोगों को छोटे-छोटे प्रशासनिक कामों के लिए भी अल्मोड़ा जाना पड़ता था। भौगोलिक दूरी और परेशानियों को देखते हुए स्थानीय प्रबुद्ध लोगों, छात्र संगठनों और जन संगठनों ने जिला गठन की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया।
तत्कालीन अल्मोड़ा जिला पंचायत अध्यक्ष जोहार सिंह परिहार ने बसपा की ऐतिहासिक रैली के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के सामने बागेश्वर को जिला बनाने और कपकोट को तहसील का दर्जा देने की मांग रखी थी।
गुसाईं सिंह दफौटी ने किया लंबा संघर्ष
बागेश्वर जिला बनाओ संघर्ष समिति के प्रमुख आंदोलनकारियों में स्वर्गीय गुसाईं सिंह दफौटी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और करीब सात महीने सेंट्रल जेल में भी बिताने पड़े। 1994-95 के दौरान उन्होंने कई दिनों तक आमरण अनशन किया। परिवार के मुताबिक पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक दबाव के बावजूद उन्होंने आंदोलन जारी रखा।
आंदोलनकारियों के संघर्ष के बाद आखिरकार 15 सितंबर 1997 को बागेश्वर को अलग जिले का दर्जा मिला।
जिला बनने के बाद बढ़ी प्रशासनिक सुविधाएं
नया जिला बनने के बाद बागेश्वर में कलेक्ट्रेट, विकास भवन, जिला अस्पताल, डिग्री कॉलेज और पुलिस लाइन जैसी संस्थाएं स्थापित हुईं। सड़कों का विस्तार भी दूरस्थ क्षेत्रों तक हुआ। इसके अलावा प्रशासनिक स्तर पर नई तहसीलों और नगर पंचायतों का गठन किया गया।
मेलाडुंगरी हेलीपैड से हल्द्वानी और दिल्ली के लिए हेली सेवा शुरू होने से कुछ क्षेत्रों में आवागमन आसान हुआ है। कपकोट और गरुड़ नगर पंचायत के साथ शामा उप-तहसील और दुगनाकुरी व काफलीगैर तहसीलों का गठन भी प्रशासनिक विस्तार का हिस्सा रहा है।
29 साल बाद भी कई चुनौतियां बरकरार
जिले के गठन को 29 वर्ष पूरे होने के बावजूद कई मूलभूत समस्याएं अब भी पूरी तरह दूर नहीं हो पाई हैं। कई सरकारी विभाग किराये के भवनों से संचालित हो रहे हैं। जिला अस्पताल के लिए अलग भवन का अभाव और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी स्वास्थ्य व्यवस्था की बड़ी चुनौती बनी हुई है।
युवाओं के लिए खेल सुविधाओं की कमी, रोडवेज डिपो की कार्यशाला का अधूरा निर्माण, खराब सड़कें और डंपिंग जोन की समस्या भी स्थानीय लोगों की चिंता का विषय है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीण आज भी सड़क, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं।
रोजगार की कमी और पलायन बनी बड़ी चिंता
बागेश्वर में रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बन पाना भी बड़ी चुनौती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक जिले में ऐसे बड़े उद्योगों का अभाव है, जो व्यापक स्तर पर रोजगार उपलब्ध करा सकें। उद्योग और रोजगार की सीमित संभावनाओं के कारण पलायन का मुद्दा आज भी गंभीर बना हुआ है।
आंदोलन का सपना और आज की तस्वीर
जिन उम्मीदों के साथ बागेश्वर को अलग जिला बनाने के लिए आंदोलन हुआ था, उनमें प्रशासनिक सुविधाओं के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था प्रमुख थी। 29 साल बाद प्रशासनिक ढांचा जरूर मजबूत हुआ है, लेकिन कई जनआकांक्षाएं अब भी पूरी होने का इंतजार कर रही हैं।

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