ख़बर रफ़्तार , हैदराबाद : अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक बार फिर चर्चा में है। हाल में IIT-Bombay के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद उनके परिवार की ओर से जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए गए और प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला के खिलाफ SC/ST Act समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया। IIT-Bombay ने जातिगत भेदभाव के आरोपों से इनकार किया है और मामले की जांच जारी है।
इस मामले के बाद SC/ST Act के उद्देश्य, इसके प्रावधानों और इसके इस्तेमाल को लेकर फिर बहस शुरू हुई है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर इस कानून को बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई थी और कानून किन परिस्थितियों में लागू होता है।
1989 में क्यों बनाया गया SC/ST Act?
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act को संसद ने 1989 में पारित किया था और यह 30 जनवरी 1990 से लागू हुआ। कानून का आधिकारिक उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना, ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की व्यवस्था करना और पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास उपलब्ध कराना है।
कानून के ‘Statement of Objects and Reasons’ में कहा गया था कि कई सामाजिक और आर्थिक उपायों के बावजूद SC और ST समुदायों के लोग भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न और गंभीर अपराधों के प्रति असुरक्षित बने हुए थे। इसमें यह भी कहा गया कि मौजूदा कानून इन विशेष परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
कानून का उद्देश्य सिर्फ सजा देना नहीं
SC/ST Act का ढांचा केवल अपराध के लिए सजा तय करने तक सीमित नहीं है। इसमें अत्याचार की रोकथाम, विशेष अदालतों के जरिए मामलों की सुनवाई और पीड़ितों को राहत एवं पुनर्वास देने की व्यवस्था भी शामिल है। कानून का आधिकारिक उद्देश्य SC/ST समुदायों के सदस्यों को अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करना है।
‘पब्लिक व्यू’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट की क्या व्यवस्था है?
SC/ST Act की कुछ धाराओं के तहत जातिसूचक अपमान या धमकी का अपराध तभी बनता है, जब घटना “किसी ऐसे स्थान पर हुई हो जो सार्वजनिक नजर में हो” (within public view)।
सुप्रीम कोर्ट ने हालिया फैसलों में स्पष्ट किया है कि केवल घटना का सार्वजनिक स्थान पर होना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि कथित घटना वास्तव में ऐसी जगह हुई थी या नहीं जहां आम लोगों की नजर पड़ सकती थी। मई 2026 के एक फैसले में कोर्ट ने कहा कि घटना और जाति आधारित अपमान का कृत्य “public gaze” में होना आवश्यक शर्त है।
निजी जगह पर हुई घटना में भी लागू हो सकता है ‘पब्लिक व्यू’
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार ‘पब्लिक प्लेस’ और ‘प्लेस within public view’ एक ही बात नहीं हैं। कोई स्थान निजी हो सकता है, लेकिन यदि वहां होने वाली घटना को बाहर मौजूद लोगों की नजर पड़ सकती है, तो परिस्थितियों के आधार पर वह ‘public view’ के दायरे में आ सकता है।
इसलिए किसी मामले में SC/ST Act की संबंधित धाराएं लगेंगी या नहीं, इसका फैसला आरोपों और मामले के तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
कानून के दुरुपयोग पर भी उठते रहे हैं सवाल
SC/ST Act को लेकर समय-समय पर इसके कथित दुरुपयोग और आरोपों की जांच से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। दूसरी ओर, कानून के समर्थक इसे SC/ST समुदायों के खिलाफ होने वाले जातिगत अत्याचारों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा मानते हैं।
ऐसे मामलों में आरोप और अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होना अपने आप में आरोप साबित होने के बराबर नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में कानून को लेकर क्या स्थिति रही है?
SC/ST Act में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं और इसके कुछ प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौतियां भी सामने आई हैं। अदालत ने अलग-अलग मामलों में कानून के प्रावधानों की व्याख्या की है, जिसमें अपराध के आवश्यक तत्व और ‘public view’ जैसी शर्तें शामिल हैं।
इस तरह SC/ST Act को समझने के लिए एक तरफ इसके ऐतिहासिक उद्देश्य और सामाजिक संदर्भ को देखना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ यह भी देखना होता है कि किसी विशेष मामले में कानून की संबंधित धारा के सभी कानूनी तत्व पूरे होते हैं या नहीं।

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