ख़बर रफ़्तार, देहरादून : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में ब्रिटिश दौर की कई ऐतिहासिक इमारतें आज भी शहर की पहचान का हिस्सा हैं, लेकिन रखरखाव के अभाव और लगातार बढ़ते व्यावसायिक दबाव के कारण कई भवन जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं। अब जिला प्रशासन ने इन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और सुरक्षा को लेकर कदम तेज कर दिए हैं।
प्रारंभिक सर्वे में देहरादून जिले में करीब 200 हेरिटेज साइट और ऐतिहासिक स्थल चिन्हित किए गए हैं। प्रशासन का उद्देश्य महत्वपूर्ण विरासत स्थलों को सुरक्षित रखने के साथ उन्हें शहर की भविष्य की टाउन प्लानिंग में शामिल करना है।
अस्तली हॉल से गुरु राम राय दरबार तक कई ऐतिहासिक इमारतें
देहरादून में ब्रिटिश वास्तुकला की कई महत्वपूर्ण निशानियां मौजूद हैं। इनमें अस्तली हॉल, एलआईसी बिल्डिंग, क्लॉक टावर, जामा मस्जिद, गुरु राम राय दरबार और सीएनआई बॉयज इंटर कॉलेज जैसे भवन शामिल हैं।
इनमें से कुछ इमारतों का आज भी व्यावसायिक इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन लंबे समय से उचित रखरखाव नहीं होने के कारण कई भवनों की स्थिति चिंताजनक हो गई है।
नगर निगम ने 21 अति-संवेदनशील भवन किए चिन्हित
जर्जर भवनों को लेकर नगर निगम के स्तर पर भी सर्वे किया गया है। इसमें 21 अति-संवेदनशील और गिरासू भवन चिन्हित किए गए हैं। इनमें से 8 भवनों में अभी भी लोग रह रहे हैं।
शहर के आढ़त बाजार, आराघर, पार्क रोड, खदरी मोहल्ला, दर्शनी गेट, मन्नूगंज, राजपुर रोड, कांवली रोड, कालागढ़ रोड, तिलक रोड, कैनाल रोड, निरंजनपुर, मोती बाजार, गांधी रोड, रेस्टकैंप, सैय्यद मोहल्ला, घोसी गली, मोहब्बेवाला, राजपुर, अंसारी रोड, पंडितवाड़ी, बल्लीवाला चौक, क्रॉस रोड, फालतू रोड, धामावाला, खुड़बुड़ा, चुक्खूवाला, भारूवाला ग्रांट, दिलाराम बाजार और इंद्रेशनगर समेत कई इलाकों में गिरासू भवन चिन्हित किए गए हैं।
एलआईसी बिल्डिंग का हिस्सा गिरने से मचा था हड़कंप
चकराता रोड स्थित एलआईसी बिल्डिंग, जिसे कनॉट प्लेस के नाम से भी जाना जाता है, जर्जर ऐतिहासिक भवनों में प्रमुख है। सितंबर 2026 में इस इमारत का एक हिस्सा अचानक गिर गया था। मलबे की चपेट में आने से एक कार और स्कूटी क्षतिग्रस्त हो गई थीं।
नगर निगम ने इस भवन को वर्ष 2013 में ही गिरासू घोषित कर दिया था। हालांकि, मालिक और किरायेदारों के बीच विवाद तथा मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण इसे अब तक ध्वस्त नहीं किया जा सका है।
1947 में बनी थी कनॉट प्लेस की इमारत
चकराता रोड स्थित एलआईसी बिल्डिंग आर्ट डेको शैली की इमारत है। इसका निर्माण वर्ष 1947 के आसपास शुरू हुआ था और करीब पांच साल में निर्माण कार्य पूरा हुआ। भवन में व्यावसायिक और आवासीय दोनों तरह के स्थान मौजूद हैं।
भवन को गिरासू घोषित किए जाने के बाद भी किरायेदारों के विरोध और कानूनी प्रक्रिया के चलते कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। सितंबर 2022 में 14 किरायेदारों को खाली करने का नोटिस दिया गया था, जबकि बाद में 65 लोगों को अंतिम अल्टीमेटम दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।
हेरिटेज संरक्षण के लिए अक्टूबर में होगी कार्यशाला
देहरादून जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान ने पिछले महीने जर्जर और ऐतिहासिक भवनों को लेकर बैठक की थी। इसमें शहर की विरासत को संरक्षित करने के साथ हेरिटेज साइटों के दस्तावेजीकरण पर भी चर्चा हुई।
हिस्टोरिक सिटी सीरीज-2026 पहल के तहत एनजीओ और हेरिटेज संगठनों को देहरादून की ऐतिहासिक विरासत का विस्तृत दस्तावेजीकरण करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन अक्टूबर 2026 में एक विशेष कार्यशाला आयोजित करने की तैयारी में है। इसमें विशेषज्ञों, नागरिकों और विभिन्न संगठनों से सुझाव लिए जाएंगे। महत्वपूर्ण हेरिटेज साइटों की पहचान के बाद उन्हें शहर की टाउन प्लानिंग प्रक्रिया में शामिल करने की योजना है।
हेरिटेज साइटों के लिए DPR तैयार होगी
जिलाधिकारी ने जिला पर्यटन विकास अधिकारी को चिन्हित हेरिटेज साइटों के संरक्षण के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद इन परियोजनाओं को राज्य सरकार की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।
इससे ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के साथ देहरादून में हेरिटेज टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
जर्जर भवन घोषित करने से पहले होगी तकनीकी जांच
जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान के मुताबिक, किसी भी भवन को जर्जर या गिरासू घोषित करने से पहले उसके तकनीकी और संरचनात्मक पहलुओं की विस्तृत जांच पर जोर दिया जा रहा है।
इसके लिए सभी उप जिलाधिकारियों, नगर निगम और नगर पालिका परिषदों को अपने-अपने क्षेत्रों में जर्जर एवं संभावित रूप से असुरक्षित भवनों का प्राथमिकता के आधार पर सर्वे और चिन्हीकरण करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन का फोकस अब सिर्फ असुरक्षित भवनों की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक महत्व वाली इमारतों को संरक्षित करने और उन्हें देहरादून की पहचान के रूप में विकसित करने पर भी है।

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