Uttrakhand में 35 हजार से ज्यादा बच्चों में मानसिक और सीखने से जुड़ी समस्याओं का अनुमान, NIMHANS की रिपोर्ट में खुलासा

ख़बर रफ़्तार , देहरादून : उत्तराखंड में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सामने आई एक अध्ययन रिपोर्ट ने स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था के सामने कई अहम सवाल खड़े किए हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS), बेंगलुरु की ओर से किए गए सर्वे के मुताबिक, प्रदेश में करीब 35,746 बच्चों और किशोरों में बौद्धिक दिव्यांगता, विशिष्ट अधिगम अक्षमता, ऑटिज्म, एडीएचडी, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएं होने का अनुमान लगाया गया है।

इस अध्ययन में बौद्धिक दिव्यांगता और विशिष्ट अधिगम अक्षमता से जुड़े मामलों की संख्या अधिक बताई गई है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि बच्चों की समस्याओं के अलावा उनके अभिभावकों में सरकारी सहायता योजनाओं, दिव्यांगता प्रमाणपत्र और संबंधित अधिकारों को लेकर जागरूकता की कमी है।

चार जिलों में किया गया सर्वे

यह सर्वे वित्तीय वर्ष 2024-25 में उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के सहयोग से किया गया। इसमें देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों को शामिल किया गया।

अध्ययन के लिए कुल 80 क्लस्टर चुने गए थे। प्रत्येक क्लस्टर से 11 पात्र बच्चों को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया था। इस तरह कुल 880 बच्चों और किशोरों के आंकड़े जुटाने की योजना थी, लेकिन रिपोर्ट में 802 प्रतिभागियों के आंकड़े शामिल किए गए।

जानकारी मुख्य रूप से अभिभावकों से ली गई, जबकि जरूरत पड़ने पर बच्चों से भी बातचीत की गई। रिपोर्ट में 35,746 बच्चों का आंकड़ा सर्वे के निष्कर्षों और जनसंख्या संबंधी अनुमानों के आधार पर तैयार किया गया है। इसके लिए जनगणना 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया, इसलिए नई जनगणना के बाद इन अनुमानों में बदलाव संभव है।

बौद्धिक दिव्यांगता के सबसे ज्यादा मामले अनुमानित

रिपोर्ट के अनुसार, बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित बच्चों और किशोरों की अनुमानित संख्या करीब 14,790 है। ऐसे बच्चों को उनकी जरूरत के अनुसार सीखने, संवाद करने और रोजमर्रा की गतिविधियों में विशेष सहायता की आवश्यकता हो सकती है।

इस श्रेणी के आकलन के लिए 6 से 17 वर्ष की आयु के 601 बच्चों को शामिल किया गया था। इनमें से छह बच्चों में विशेषज्ञ स्तर पर निदान की पुष्टि हुई।

वहीं, विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी के आकलन के लिए 8 से 17 वर्ष की आयु के 508 बच्चों का मूल्यांकन किया गया। इनमें छह बच्चों में निदान की पुष्टि हुई।

चिंता, अवसाद, ऑटिज्म और ADHD के भी मामले

अध्ययन में अन्य मानसिक और विकास संबंधी समस्याओं के अनुमानित आंकड़े भी सामने आए हैं।

  • चिंता और अवसाद: करीब 5,067 बच्चों और किशोरों के प्रभावित होने का अनुमान।
  • ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर: लगभग 2,445 मामले अनुमानित।
  • एडीएचडी (ADHD): करीब 1,075 बच्चों और किशोरों के प्रभावित होने का अनुमान।

ये आंकड़े पूरे राज्य के लिए लगाए गए अनुमान हैं, न कि प्रत्येक मामले में विशेषज्ञों द्वारा पुष्टि किए गए निदान। इसलिए किसी बच्चे में स्क्रीनिंग के दौरान संकेत मिलने को बीमारी की अंतिम पुष्टि नहीं माना जा सकता। इसके लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञ से मूल्यांकन कराना जरूरी है।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता में कमी

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बच्चों की मानसिक और विकास संबंधी समस्याओं के बारे में लोगों की जानकारी असमान है। सर्वे में 78.16 प्रतिशत लोगों ने अवसाद के बारे में जानकारी होने की बात कही। इसके मुकाबले बौद्धिक दिव्यांगता के बारे में जानकारी रखने वालों का अनुपात 12.15 प्रतिशत और ADHD के बारे में जागरूक लोगों का अनुपात केवल 5.40 प्रतिशत दर्ज किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार डर, अत्यधिक चिंता, उदासी, सामाजिक संवाद में कठिनाई, ध्यान केंद्रित करने में परेशानी या व्यवहार में असामान्य बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे संकेत दिखने पर बच्चे का उचित मूल्यांकन कराया जाना चाहिए।

UDID और दिव्यांगता प्रमाणपत्र की जानकारी बेहद कम

अध्ययन में यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) और दिव्यांगता से संबंधित सरकारी सहायता के बारे में अभिभावकों की जानकारी का भी आकलन किया गया।

रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, 385 अभिभावकों में से केवल 0.26 प्रतिशत को UDID के बारे में जानकारी थी। किसी भी अभिभावक को इससे मिलने वाले लाभों की जानकारी नहीं थी।

वहीं, केवल 3.64 प्रतिशत अभिभावकों को पता था कि दिव्यांगता का आकलन कहां कराया जाता है। महज 1.04 प्रतिशत ने अपने बच्चे का आकलन कराया था, जबकि 0.78 प्रतिशत अभिभावकों के पास बच्चे का दिव्यांगता प्रमाणपत्र था।

रिपोर्ट में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017, राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 और किशोर न्याय अधिनियम 2015 के बारे में भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।

स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत

अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक, बच्चों की समस्याओं की समय पर पहचान के साथ उन्हें जरूरी सहायता उपलब्ध कराना भी बड़ी चुनौती है। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं, स्कूलों और परिवारों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।

स्कूलों में विशेष शिक्षकों, काउंसलर और प्रारंभिक हस्तक्षेप सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है। साथ ही, ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों को जांच, उपचार, दिव्यांगता प्रमाणपत्र और सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

सर्वे के बाद सहायता सेवाएं उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती

यह अध्ययन उत्तराखंड में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरतों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। हालांकि, अनुमानित आंकड़ों को वास्तविक सहायता में बदलना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

अब जरूरी है कि बच्चों की समय पर स्क्रीनिंग के बाद विशेषज्ञ मूल्यांकन, उपचार, स्कूली सहयोग और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की जाए। साथ ही, अभिभावकों को यह जानकारी भी दी जाए कि बच्चे की समस्या का आकलन कहां होगा और जरूरत पड़ने पर किस तरह की सहायता मिल सकती है। तभी इस अध्ययन के निष्कर्ष बच्चों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने में मददगार साबित होंगे।

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