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Wednesday, May 22, 2024
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पेशावर कांड की 94वीं बरसी, जब गढ़वाली ने नहीं माना अंग्रेजों का हुक्म, निहत्थे पठानों पर नहीं चलाई गोली, 11 साल एबटाबाद जेल में रहे

ख़बर रफ़्तार, देहरादून: पेशावर कांड की आज 94वीं बरसी है. इस मौके पर उत्तराखंड के राजनेताओं और इतिहासकारों ने पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को याद किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी. पेशावर कांड 23 अप्रैल 1930 को घटित हुआ था. इसी दिन दुनिया का एक वीर सैनिक से परिचय हुआ था, जिनका नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली था, जो उत्तराखंड के पौड़ी जिले के रहने वाले थे. जिन्होंने पेशावर में अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करने वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था. इतना ही नहीं वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने साम्राज्यवादी अंग्रेजों की जड़ें तक हिलाकर रख दी थीं.

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का परिचय: वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसंबर 1891 में हुआ था. वीर चंद्र के पूर्वज गढ़वाल की राजधानी चांदपुरगढ़ के थे. तीन सितंबर 1914 को वीर चंद्र सिंह ब्रिटिश सेना में भर्ती हुए थे. वीर चंद्र सिंह ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में मेसोपोटामिया के युद्ध में हिस्सा लिया था, जिसमें अंग्रेजों की जीत हुई थी. इसके बाद वीर चंद्र सिंह ने 1918 में बगदाद की लड़ाई में हिस्सा लिया था.

गांधी जी से मिलने के बाद जागी देश भक्ति: प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कई सैनिकों को निकाल दिया था. वहीं कई सैनिकों के पदों को भी कम कर दिया था, जिनमें वीर चंद्र सिंह गढ़वाली भी थे. चंद्र सिंह गढ़वाली को भी हवलदार से सैनिक बना दिया गया था, जिस कारण चंद्र सिंह गढ़वाली ने सेना छोड़ने का मन बना लिया था. हालांकि ब्रिटिश सेना के अधिकारियों ने समझाने पर वो रुक गए थे और उन्हें कुछ समय का अवकाश दे दिया गया था. तभी चंद्र सिंह गढ़वाली महात्मा गांधी के संपर्क में आए थे. तब चंद्र सिंह गढ़वाली में देश भक्ति का जज्बा पैदा हो गया था. अंग्रेजों को ये रास नहीं आया और उन्होंने चंद्र सिंह गढ़वाली को खैबर दर्रा के पास भेज दिया था. उस समय तक चंद्र सिंह गढ़वाली मेजर हलवदार के पद पर पहुंच चुके थे.

आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से गढ़वाली ने कर दिया था इंकार: उस समय पेशावर में स्वतंत्रता संग्राम की लौ पूरे जोरशोर से जल रही थी, जिसको अंग्रेज कुचलना चाहते थे. इस काम का जिम्मा अंग्रेजों ने मेजर हलवदार चंद्र सिंह गढ़वाली को दिया. 23 अप्रैल 1930 को अंग्रेजों ने चंद्र सिंह गढ़वाली को पेशावर भेजा. ब्रिटिश आर्मी के अधिकारियों ने चंद्र सिंह गढ़वाली को निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया, लेकिन चंद्र सिंह गढ़वाली ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोली चलाने से साफ इंकार कर दिया, जिसे पेशावर कांड के नाम से जाना गया. इसी के बाद से चंद्र सिंह को चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम मिला और इनको पेशावर कांड का नायक माना जाने लगा.

चंद्र सिंह गढ़वाली को मिली विद्रोह की सजा: ब्रिटिश आर्मी का हुक्म नहीं मानने पर गढ़वाल बटालियन के सैनिकों पर मुकदमा भी चला था. गढ़वाल बटालियन के सैनिकों की पैरवी बैरिस्टर मुकुन्दी लाल ने की थी, जिनके प्रयास से ही चंद्र सिंह गढ़वाली की मृत्युदंड की सजा कैद में बदली गई थी. ब्रिटिश सरकार ने चंद्र सिंह गढ़वाली की सारी संपत्ति जब्त कर ली थी और उनकी वर्दी भी उनके शरीर से काट-काट कर अलग की गई थी.

11 साल जेल में रहे चंद्र सिंह गढ़वाली: चंद्र सिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिए ऐबटाबाद जेल में भेजा गया था. हालांकि बाद में चंद्र सिंह गढ़वाली की सजा कम की गई और 11 साल के बाद 26 सितंबर 1941 को अंग्रेजों ने चंद्र सिंह गढ़वाली को आजाद कर दिया था. हालांकि अंग्रेजों ने चंद्र सिंह गढ़वाली पर कुछ प्रतिबंध भी लगा दिए थे, जिस कारण वो एक जगह लंबे समय तक नहीं रुक सकते थे. आखिर में चंद्र सिंह गढ़वाली वर्धा में महात्मा गांधी के पास गए और उनसे प्रभावित होकर 8 अगस्त को 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े.

भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई भूमिका: चंद्र सिंह गढ़वाली ने इलाहाबाद में रहकर भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी, जिस कारण अंग्रेजों ने फिर से चंद्र सिंह गढ़वाली को गिरफ्तार कर लिया था. उन्हें तीन साल के लिए जेल भेज दिया था. उसके बाद 1945 में चंद्र सिंह गढ़वाली जेल से बाहर आ गए. इसके बाद 22 दिसंबर 1946 में कम्युनिस्टों के सहयोग से चंद्र सिंह गढ़वाली गढ़वाल में प्रवेश कर सके. वहीं 200 सालों की गुलामी के बाद 1947 में भारत आजाद हो गया था.

आजाद भारत में चुनाव भी लड़ा: चंद्र सिंह गढ़वाली ने आजाद भारत में 1957 में चुनाव भी लड़ा था, लेकिन वो जीत नहीं पाए थे. एक अक्टूबर 1979 को चंद्र सिंह गढ़वाली का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था. 1994 में भारत सरकार ने चंद्र सिंह गढ़वाली के सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया था और कई सड़कों के नाम भी इनके नाम पर रखे थे.

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